sandeep sir
Tuesday, 9 October 2012
Monday, 1 October 2012
चोट पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया,
पत्थर को बुत की शकल में लाने का शुक्रिया.
जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए,
ऐ - नींद आज तेरे ना आने का शुक्रिया.....
सूखा पुराना ज़ख़्म नए को जगह मिली,
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया...
अश्कों सा माँ की गोद में आकर सिमट गया,
नज़रों से अपनी, मुझको गिराने का शुक्रिया.....SANDEEP SIR
अश्कों सा माँ की गोद में आकर सिमट गया,
नज़रों से अपनी, मुझको गिराने का शुक्रिया.....SANDEEP SIR
Wednesday, 19 September 2012
Saturday, 15 September 2012
आज होंश तू मेरे गुम रहने दे,
जी लिया हूँ बहुत मैं 'हकीक़त' के ज़माने में,
अब बेहतर है तू मुझे ग़लत-फहमी में जीने दे।
भीड़ में खो जाता हूँ अक्सर,
जी लिया हूँ बहुत मैं 'हकीक़त' के ज़माने में,
अब बेहतर है तू मुझे ग़लत-फहमी में जीने दे।
भीड़ में खो जाता हूँ अक्सर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
अकेले ही चलने दे।
आहें उठती हैं यहाँ दर-ब-दर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
धडकनों के साज़ सुनने दे।
झूठे मुस्कुराते चेहरे कई दीखते हैं इधर-उधर
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
अकेले ही सिसकने दे।
दर्द और ज़ख्मों के सहारे मिलते हैं बस यहाँ पर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
बेसहारा ही रहने दे।
हादसों पर हादसे होते हैं हर मोड़ पर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
चैन औ सुकून से मरने दे।
'अजीब' सी यह हसरत पूरी करने दे,
आज होंश तू मेरे गुम रहने दे,
बेहतर है तू मुझे ग़लत-फहमी में जीने दे।
अकेले ही चलने दे।
आहें उठती हैं यहाँ दर-ब-दर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
धडकनों के साज़ सुनने दे।
झूठे मुस्कुराते चेहरे कई दीखते हैं इधर-उधर
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
अकेले ही सिसकने दे।
दर्द और ज़ख्मों के सहारे मिलते हैं बस यहाँ पर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
बेसहारा ही रहने दे।
हादसों पर हादसे होते हैं हर मोड़ पर,
बेहतर है मुझे ग़लत-फहमी में
चैन औ सुकून से मरने दे।
'अजीब' सी यह हसरत पूरी करने दे,
आज होंश तू मेरे गुम रहने दे,
बेहतर है तू मुझे ग़लत-फहमी में जीने दे।
sandeep sir
तोहफा........
तेरा तोहफा संभाल रखा है
गम को सीने में पल रखा है ॥
तेरा तोहफा संभाल रखा है
गम को सीने में पल रखा है ॥
उसने देख नहीं है आईना
जिसने तेरा ख्याल रखा है ॥
अपनी गजलो में अपनी गीतों में
हमने तेरा जमाल रखा है ॥
कौन हमदर्द है परिंदों का
किसने दानो पे जाल रखा है ॥
वह जरा मूत माइन नहीं होते यहाँ
कलेजा निकाल रखा है ॥
मत देखा खबाब हमको जन्नत के
हमने सब देखभाल रखा है ।।
मौत ने फिर आज मेरे
आगे जिन्दगी सवाल रखा है ॥
आज बैचेन है मेरी आँखे
उसने घूँघट निकाल रखा है ॥
जिसने तेरा ख्याल रखा है ॥
अपनी गजलो में अपनी गीतों में
हमने तेरा जमाल रखा है ॥
कौन हमदर्द है परिंदों का
किसने दानो पे जाल रखा है ॥
वह जरा मूत माइन नहीं होते यहाँ
कलेजा निकाल रखा है ॥
मत देखा खबाब हमको जन्नत के
हमने सब देखभाल रखा है ।।
मौत ने फिर आज मेरे
आगे जिन्दगी सवाल रखा है ॥
आज बैचेन है मेरी आँखे
उसने घूँघट निकाल रखा है ॥
SANDEEP SIR
लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं
मैं न जुगनू हूँ , दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं
नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं
मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यों हैं......
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं
मैं न जुगनू हूँ , दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं
नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं
मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यों हैं......
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