Wednesday, 5 September 2012

मैं, न तो कांच की गुडिया हूँ ,
न मोम की मूरत .....

मैं अमरबेल हूँ !
फुनगी-फुनगी लहरा सकती हूँ !!!
ज़ख्म-ज़ख्म एहसासों के बाबजूद,

मुस्करा सकती हूँ !
मौत को भी जिन्दगी का,
सबक पढ़ा सकती हूँ 
 
SANDEEP SIR

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